ख्वाब…

ख्वाब…

ख्वाब आते हैं और जगाते हैं
अधखुली नींद और बन्द सी पलकों के भीतर से
दिखता है कि जैसे
आप का साया, आप की परछाई
बगल में बैठा
सहला रहा हो मेरे बिगड़े हुए बालों को
कंघी की तरह
उसमे आइ सिलवटों को एक सीध में करते
जैसे अब मेरी मासूमियत ढूंढ रहा हो
कंघी के जुएँ ढूंढने की तरह !
मासूमियत
वही जो आप को दिखीं
मेरी शरारतों में
मेरे बेबाक बातों में
मेरी आँखों मे
जो किनारों से ही
बस आपको ताकते रहते थे
अनायास, अनाहक
बेवजह, वजह ढूंढती हुई !
मासूमियत
जो अब दिखाई नहीं देती
शायद उम्र की ढलान में
बिखर गईं हैं
पहाड़ी रास्तों में बेकन्ट्रोल ट्रक की तरह
जो अपने ही बोझ से क्रैश हो गया हो !
ख्वाब आते हैं, और जगाते हैं
भीगे बालों की खूशबू, और बालों से टपकती बूँदें
कम चीनी और नींबू वाली चाय की महक
और लगता है आप आए !
है ना अजीब सी बात,
ताउम्र एक ख्वाब ले के बैठे रहे
जैसे ट्रैफिक चौक पे वो औरत
भीख के ख्वाब में
अपने नकली बच्चे को सीने से लगाती है
जैसे रोजा तोड़ने के ख्वाब में
मुल्ला पानी को ताकता है
जैसे आखिरी कश के लिए कोई सिगरेट जलाता है !
ख्वाब जो ठहरे,
हकीकत…
अब ख्वाब दस्तक नहीं देते
ख्वाब झकझोर जाते हैं
वही ख्वाब जो ख्वाब रह गए।

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